Wednesday, May 12, 2010



















रेशन 


पिछली फ़ाइनल रिपोर्ट में हम ने बताया था के किस कार्ड पर किसे कितना अनाज मिलना चाहिए.
मगर जिन के पास कार्ड ही न हो, वोह ग़रीब लोग जिन के पास घर ही न हो, वोह लोग सडको के किनारे फूटपाथ पर रहते है, जिन का कोई ठिकाना न हो?


ऐसे लोगो को `बेघर कार्ड` दिया जाता है. इस रेशन कार्ड पैर पूरे महीने में कभी भी 35 Kg . अनाज मिलने की सुविधा है, जोके 7 Rs. गेहू और 9 Rs.चावल के हिसाब से मिलता है.


हम अक्सर देखते है के सडको के किनारे हमारे देश के बुज़ुर्ग बूढ़े यहाँ-वह भीक मांग रहे है, उन की हालत बहुत ही ख़राब है, उन लोगो के लिए “अन्ना पूर्ण” नाम की योजना सर्कार  ने  रक्खी  है , जिस  में  65 साल  के  ऊपर  के  बुजुर्गो  के  लिए  10 Kg अनाज  बिलकुल  मुफ्त  दिया  जाता  है.


हमे  बहोत  सी  जगह  `बेघर  कार्ड ` और  अन्ना  पूर्ण  के  बहोत  से  हक़दार  दिखाई  देते  है , मगर  यह  लोग  सडको  पर  भिक  मांग  कर  या  दुसरे  कोई  छोटे–मोटे  काम  करके  अपना  गुज़ारा  करते  है, ऐसा क्या ?

1) इन्हें  इन  योजनाओ  के  बारे  में  जानकारी  ही  नहीं है.
2) यह  लोग  रेशन  की  दुकान  पर  गई  होंगे , मगर  दुकानदार  ने  उन्हें  भगा  दिया  होंगा ,
3) या  यह  लोग  ऐसे  ही  खुश  है  की  कों  दुकान  पर  जाये, बिना  हाथ  पैर   हिलाई  थोड़ी  से  मेहनत  से  उन्हें  कुछ- न -कुछ  मिल  रहा  है .


अगर  इन्हें  इन  योजनाओ  केबारे  में  जानकारी  नहीं  है  तो  उन्हें  बताय  कोन?
क्या यह  ज़िम्मेदारी  रेशन  ऑफिसर  की  नहीं  है ? वोह यह  देखे  की  उस  के  Working इलाके  में  इस  योजना  के  कितने  हक़दार  लोग है, वोह  उन्हें  खुद  जाकर  बताये  की  आप  लोगो  को  यहाँ-वहा हाथ  फैलाने  की  ज़रुरत  नहीं  है, सरकार  ने  आप  जैसे  लोगो  के  लिए  अलग  इन्तेजाम  किया  हुवा  है, आप  लोग  रेशन  की  दुकान  पर  जाकर  अपने  हिस्से  का  अनाज  ले  सकते  है, मगर  उस  बेचारे  के  पास  फालतू  समय  कहा  है ?
क्या  यह  ज़िम्मेदारी  रेशन  दुकानदार  की  नहीं  है? की  वोह  देखे  की  उस  की  दुकान  के  करीब  कोई  ग़रीब  भीख  मांग  कर  अपना  और  अपने  परिवार  का  पेट  भर  रहा  है. पर  दुकानदार  अपनी  दुकान  छोड़  कर  क्यों  जय  इन  बेकार  बातो के  लिए . अगर  कोई  भिकारी  उस की  दुकान  पर  आ  भी  जाता  है  तो  वोह  उसे  2-5 रूपए देकर  चलता  कर  देंगा.
तो  क्या  यह  ज़िम्मेदारी  हम  जैसे  Social  Workers की  नहीं  है? मगर  हम  भी  यही  सोचते  है  की  जब  रेशन  Officer को  उन  की  फिकर  नहीं  है. जब  दुकानदार  के  पास  समय  नहीं  है , तो  हम  क्या  कर  सकते  है, चाहे  हमारे  रिक्शा के  सामने  कोई  औरत  एक  बच्चा  गोद  में  और  एक  बच्चा  अपनी  कोख  में  लिए  हमारे  सामने  हाथ  फैले.


या  जब  हम  कभी  बरसात  के  मोसम  में  किसी  ठेले  वाले  से  गरम-गरम  पकोड़ो का  मज़ा  ले  रहे  हो  और  उस  समय  हमारे  सामने  बारिश  में  भीगती  हुई  कोई  बुढया हम  से  कुछ  खाने  को  मांगे,


या  फिर  फूट  पथ  पर चलते  समय  हमें  कोई  कमज़ोर  बीमार  भूखा  ग़रीब  बूढा  दिखाई  दे.
हम  क्या  करेंगे, हम  उन्हें  कुछ  पैसे  या  थोडा  खाना  देकर  अपना  पीछा  छुड़ा लेंगे,
मगर  हम  उन्हें  रतिओं  की  दुकान  पर  लेजाकर  यह  नहीं  बताएँगे  के  तुम्हे  हमारे  या  किसी  के  भी  आगे  हाथ  फैलाने  की  कोई  ज़रुरत  नहीं  है, तुम्हारे  लिए  सरकार  ने  अनाज  का  इन्तेजाम  किया  हुवा  है,
मगर  हम  यह  सब  क्यों  करे , हम  कोई  Mather Tressa थोड़ी  है, Social Work बोलने  सुनने  और  लिखने  के  लिए  ही  अच्छा  लगता  है.


जोगेश्वरी  का  इतिहास 

· जोगेश्वरी  देवी  मंदिर  के  नाम  पर  इस  जगह  का  नाम  रखा  गया .


· एक  तरफ  w.e. highway है , तो  उसी  को  छूता  जोगेश्वरी-विखरोली link road है.


· बोरीवली  नेशनल  पार्क  का  जंगल  इसी  link road पर  समाप्त  होता  है .


· जिस  तरह  नेशनल  पार्क  के  पहाड़ो  पर  गुफाये  (canary cavas)  है, उसी  तरह  की 
· दो  गुफा  जोगेश्वरी  में  भी  है . 
· जोगेश्वरी  स्टेशन  से  जो  रोड  निकलता  है , उसे  गुफा  रोड  कहते  है.


· गुफा  रोड  जहा  ख़तम  होता  है , वही  jogeshwari  देवी  का  मंदिर  है.
· स्टेशन  से  बहार  निकलते  ही  ismail yusuf college है , जिस  की  शुरुवात  1924 में  हुई  थी .


· W.E. highway के  करीब  का  इलाका  प्रेम  नगर  कहलाता  है . हमारी  पहले  research   की  शुरुवात  यही  से  हुई  थी .


· ये  इलाका  1960-65 में  बसना  शुरू  हुवा .


· Colaba, bandra , और  andheri की  बस्तियों  को  यहाँ  shift किया  गया  था .

· ये  लोग  जहा  से  आये  थे  इन्होने  अपने  मोहल्ले  का  नाम  भी  वैसा  ही  रक्खा . जैसे  बांद्रा  से  आये  हुए  लोगो   ने  बांद्रा  प्लाट , कोलाबा  से  आये  हुए  लोगो  ने  कोलाबा  प्लाट  और  अँधेरी  से  आये  हुए  लोगो  ने  अँधेरी  प्लाट .


· बाद  में  मुंबई  के  तड़ीपार  अपराधी  भी  यहाँ  आना  शुरू  हुआ .


· जिन्होंने  आते  ही  यहाँ  की  ज़मीनों  पर  कब्ज़ा  करना  शुरू  किया  ,
· कच्चे  माकन  बनाये  और  इन्हें  किराये  पर  देने  लगे ,
स्टेशन  के  करीब  ही  एक  shoes company थी , जिस  का  नाम   c.s.c. (carona shoes co.) था , इस  company में  काम  करने  वाले  workers ने  प्रेम  नगर  की  बस्तियों  में  किराये  से  माकन  लेकर  रहने  लगे ,
बाद  में  इन्द्रा  गाँधी  ने  photo pas system कानून  लागु  किया , जिस  में  जो  लोग  15 साल  से  एक  ही  किराये  के  माकन  में  रहते  है , वो  माकन  उस  का  हो  जायेंगा . लोग  रातो  रात  माकन  के  मालिक  बन  गए . मगर  आज  भी  उन  अपराधियों  के  बच्चो  का  दबदबा  कायम  है .


बांद्रा  प्लाट  , अँधेरी  प्लाट  , कोलाबा  प्लाट  , ईद गाह मैदान , रामगढ़  , ये  सब  इलाका  U.P. west Bengal और  Maharashtra से  आये  हुए  लोगो  के  थे . जिन  में  मुसलमानों  की  आबादी  करीब  70 % थी . आज  यहाँ  90% मुस्लिम  रहते  है .
प्रेम  नगर  जहा  समाप्त  होता  है  वहा  से  मेघ वाड़ी , सर्वोदय  नगर , मजास  वाड़ी , और  शंकर  वाड़ी  नाम  की  बस्तिया  शुरू  होती  है , जो  के  प्रेम  नगर  के  चारो  तरफ  फैली  हुई  है , और  यहाँ  हिन्दू  समाज  की  आबादी  90% है . हमारी  advance research का  आगाज़  (शुरुवात ) यही  से  होगा .














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